तमाम अभियानों के बावजूद भारत में मातृत्व एवं शिशु स्वास्थ्य की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हो रहा है। कुपोषण के अलावा नवजात शिशु की मृत्यु-दर के आंकड़े भी डराते हैं। इस महीने दिल्ली में हो रहे ग्लोबल पार्टनर्स फोरम 2018 का मेज…

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सुरक्षित प्रसव पर ध्यान देना जरूरी

तमाम अभियानों के बावजूद भारत में मातृत्व एवं शिशु स्वास्थ्य की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हो रहा है। कुपोषण के अलावा नवजात शिशु की मृत्यु-दर के आंकड़े भी डराते हैं। इस महीने दिल्ली में हो रहे ग्लोबल पार्टनर्स फोरम 2018 का मेजबान भारत है। ऐसे में जरूरी है कि इस पहलू पर गंभीरता से विचार किया जाए।

आजादी के कई दशकों बाद भी देश में स्त्रियों और बच्चों की स्थिति को लेकर आशाजनक $खबरें नहीं सुनने को मिलतीं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य की स्थिति में बहुत सुधार नहीं आया है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में स्थिति जयादा बुरी है। 

स्त्रियों और बच्चों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने की दिशा में बने ग्लोबल पार्टनर्स फोरम 2018 का आयोजन इस महीने दिल्ली में किया जा रहा है। इस फोरम में 1200 पार्टनर देश हैं, जो इस मुहिम में साथ खड़े हैं। इस बार फोरम की मेहमानवानी भारत सरकार ने निभाई है। ऐसे में जरूरी है कि स्त्री स्वास्थ्य के कुछ अनदेखे-अनछुए पहलुओं पर भी बात की जाए और विचार किया जाए कि इतनी कोशिशों के बावजूद अपेक्षित नतीजे क्यों नहीं मिल रहे हैं।

ऐसे ही कुछ अहम सवालों को लेकर भारत में यूनिसेफ प्रतिनिधि डॉ. यासमीन अलीहक से हुई एक बातचीत।

 भारत में वे कौन से स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे हैं, जिन पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है?

पिछले कुछ वर्षों में अंडर-5 आयु वर्ग के बच्चों की सेहत में तेजी से सुधार आया है लेकिन हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती नवजात की मृत्यु दर है। इस दिशा में जो बाधाएं आ रही हैं, उनका निदान करना हमारी प्राथमिकता है। क्या लेबर रूम में स्त्रियों के साथ सही बर्ताव किया जा रहा है? क्या वहां स्वच्छता के नियमों का पालन हो रहा है? क्या वहां पर्याप्त प्राइवेसी होती है? वहां का स्टाफ कैसा है और क्या वे सही ढंग से ट्रेंड हैं….इन सभी सवालों के सही जवाब तलाशना भी हमारा मकसद है।

 किस तरह की चुनौतियां आ रही हैं?

सबसे पहले तो कुपोषण के बिंदु पर तेजी से काम करना चाहिए। गर्भवती के स्वास्थ्य और खानपान के अलावा प्रसव क्रिया को सुरक्षित करना एक चुनौती है। स्वस्थ बच्चे का जन्म तभी संभव है, जब गर्भावस्था में मां को उचित पोषण मिले। इसके अलावा बच्चे का सुरक्षित जीवन भी महत्वपूर्ण है, खासतौर पर तीन वर्ष की आयु तक। मां और नवजात के स्वास्थ्य की दिशा में का$फी कुछ किया जाना बा$की है। उन्हें किसी भी तरह की जटिलता से बचाने के लिए चिकित्सालयों में पर्याप्त मेडिकल उपकरण भी चाहिए।

 पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री स्वास्थ्य को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?

स्त्री स्वास्थ्य बहुत हद तक परिवार, समाज और स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर करता है। पिछले कुछ वर्षों से लोगों की मानसिकता बदली है। गांव-देहात में स्त्रियां गर्भावस्था के दौरान नियमित चेकअप करवाती हैं। अब घर में प्रसव कराने के बजाय लोग अस्पताल जा रहे हैं। प्राथमिक चिकित्सालयों की दशा सुधरी है। वहां प्रशिक्षित मिडवाइफ और नर्स हैं। जयादातर जगहों में गर्भवती को अस्पताल ले जाने और घर लाने के लिए ट्रांस्पोर्ट सुविधा मौजूद है। केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के उदाहरण सामने हैं। अन्य राज्यों को भी उनका अनुसरण करना चाहिए।

 प्रेग्नेंसी के दौरान मृत्यु दर को कैसे कम किया जा सकता है?

कोई भी यह नहीं बता सकता कि गर्भवती को कब और कैसी जटिलता का सामना करना पड़ सकता है लेकिन इस बारे में लोगों को जागरूक किया जा सकता है ताकि नियमित चेकअप के जरिये गर्भावस्था में आने वाली जटिलताओं को पहचाना जा सके और उसके हिसाब से तुरंत इलाज की प्रक्रिया शुरू हो सके। इंस्टीट्यूशनल डिलिवरी को बढ़ावा देने से प्रसूता की देखभाल में इजाफा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में आशा जैसे हेल्थ वर्कर्स ने भी स्त्रियों के बीच भरोसा जगाया है। दरअसल इस बारे में पूरे सिस्टम को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। परिवारों की सोच बदलने के साथ ही हेल्थ केयर संसाधनों की उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा।

 यूनिसेफ का इस दिशा में क्या योगदान हैै?

पहली चीज है, लोगों का जागरूक होना। इसलिए डब्लूएचओ के साथ मिल कर यूनिसेफ लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की कोशिश में जुटा है। हम सरकार के साथ मिल कर केयर मॉडल को स्ट्रॉन्ग बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। फिर चाहे बात मेनपॉवर ट्रेनिंग, लेआउट या इक्विपमेंट्स की हो….हर दिशा में काम किया जा रहा है। अगले चरण में हम बाल विवाह को लेकर भी काम शुरू करना चाहते हैं।

प्रस्तुति : इंदिरा

 

Posted By: Sakhi User